“रब रूठा नहीं”

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साथ जो तेरा छूटा नहीं,
समझो रब रूठा नहीं।
        दिखाएंगे सफल होकर एक दिन,
        देखा था जो सपना वो झूठा नहीं।
रास्ते नए हैं तो फिर क्या हुआ,
अभी तक तो रास्ता पूछा नहीं।
         चला था अकेला के तुम मिल गए,
         मिला साथ तुम्हारा फिर छूटा नहीं।
टेढ़ी मेंढ़ी राहों पर कई बार मैं गिरा,
खाई ठोकरें पर मैं कभी रुका नहीं।
        लग्न है सच्ची और विश्वास खुद पर,
         मुश्किलों के आगे भी वो झुकता नहीं।
चाहे देर से सही मिलेगी मंज़िल मुझे,
मैं इतना जानूं मुझसे रब रूठा नहीं।
बृज किशोर भाटिया,चंडीगढ़

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