चंडीगढ़
13 मई 2018
दिव्या आज़ाद
कला व संस्कृति को पूर्ण रूप से समर्पित संस्था प्राचीन कला केन्द्र अपनी स्थापना वर्ष 1956 से निरंतर भारतीय शास्त्रीय कलाओं का प्रचार प्रसार व संरक्षण कर कला जगत में अहम भूमिका निभा रहा है केन्द्र द्वारा आयोजित होने वाली परीक्षाओं में उतीर्ण हुए विद्यार्थीयों के लिए समय-समय विभिन्न प्रांतों में दीक्षांत समारोह का आयोजन किया जाता रहा है। अपनी इसी श्रृंखला के अन्तर्गत केन्द्र उतरी क्षेत्र जिसमें शामिल है। पंजाब,हरियाणा,हिमाचल प्रदेश तथा केन्द्र शासित प्रदेश चंडीगढ़ विद्यार्थीयों के लिए रविवार 13 मई को स्थानीय डाॅ.एम.एस.रंधावा सभागार पंजाब कला भवन में प्रातः 11 बजे दीक्षांत समारोह का आयोजन किया गया जिसके अन्तर्गत भास्कर पूर्ण ;सत्र 2017  तथा विशारद पूर्ण ;वार्षिक 2016.2017 एवं अर्ध वार्षिक सत्र 2017 के विद्यार्थीयों को उक्त मेडल एवं प्रमाण पत्रों से पुरस्कृत किया गया। इस अवसर पर मुख्य अतिथि के रूप में अनूजीत कौर,प्रदेश शिक्षा अधिकारी,शिक्षा विभाग,चंडीगढ़ एवं नाॅर्थजोन कल्चरल सेंटर के निदेशक प्रोफैसर सौभाग्य वर्द्धन ने संबोधन भाषण दिया एवं उन्होंने इस अवसर पर केन्द्र के संगीत एवं कला के क्षेत्र में योगदान की प्रशंसा करके विद्यार्थीयों को भारतीय कला के प्रति सर्मपण के लिए प्रेरित किया।
प्राचीन कला केन्द्र की संपूर्ण भारत ही नहीं बल्कि विदेशों में भी कुल मिलाकर 3500 से अधिक शाखाएं हैं जिसमें भारतीय शास्त्रीय संगीत,नृत्य एवं चित्रकला जैसी विधाओं की शिक्षा दी जाती है। दीक्षांत समारोह में विद्यार्थीयों को विशारद एवं भास्कर के प्रमाण पत्र एवं डिप्लोमा प्रदान करने के अतिरिक्त प्राचीन कला केन्द्र की अन्य रीत भी है जिसमें केन्द्र एक मंझे हुए कलाकार को भी सम्मानित करता है। इस बार केन्द्र द्वारा श्री नंद किशोर नारद एवं गुरू ए.एस.गिल महाराज को स्मृति चिन्ह एवं शाल एव 11000 रूपए  देकर सम्मानित किया गया।
प्राचीन कला केन्द्र की कुशल कार्यप्रणाली के कारण देश के सभी हिस्सों में विद्यार्थीयों की संख्या निरंतर बढ़ रही है। सत्र 2016.2017 में 326040 विद्यार्थी केन्द्र द्वारा आयोजित विभिन्न परीक्षाओं मंे बैठे। जिसमें 14470 विद्यार्थी पंजाब,हरियाणा,हिमाचल प्रदेश एवं चंडीगढ़ से शामिल हुए। जिसमें भास्कर पूर्ण की परीक्षा में कुल 55 विद्यार्थी बैठे और 96ः जबकि विशारद पूर्ण कुल 623 विद्यार्थी जिसका परिणाम 83ः रहा
संगीतमय कार्यक्रम
दीक्षांत समारोह के उपरांत केन्द्र की भास्कर पूर्ण एवं विशारद पूर्ण की परीक्षाओं में सर्वोच्च स्थान प्राप्त करने वाले विद्यार्थीयों ने मंच प्रस्तुति दी। सबसे पहले श्री ब्योमकेश जेना ने शास्त्रीय गायन की प्रस्तुति दी जिसमें उन्होंने आलाप के बाद भीम पलासी में विलम्बित बंदिश ‘‘पिया मूसे कहे ना बोली री सजनी’’ के पश्चात छोटा ख्याल तीन ताल में ‘‘जा-जा रे अपने मंदिरवा’’ तथा अपने कार्यक्रम का समापन इन्होंने ‘‘तराने’’ से किया तथा हाल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा । उपरांत पटियाला से आए श्री अर्पित मानकतला ने तबला वादन प्रस्तुत किया जिसमें उन्होंने कायदे,पल्टे,लड़ी इत्यादि का प्रदर्शन किया। कार्यक्रम के अंत में प्रीती राजगढ़िया ने भरतनाट्यम प्रस्तुत किया। जिसमें उन्होंने गीत गोबिन्द रचित अष्टपदी प्रस्तुत की ।

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